रामपुर तिराहा कांड को सुलझने में लग गए तीस साल

आज की खबर है , तीस साल पहले की जिसने ने पूरे सूबे को दहला कर रख दिया था। इस घटना में पुलिस की गोलियों से लोग मारे गए, और बहुत सी लाशो को खेतो में दबा दिया गया। औरतो के साथ दुष्कर्म किया गया , उस समय मुख्यमंत्री पद पर श्री मुलायम सिंह उडाव जी थे। अब तीस साल के बाद एक फैसला इस केस से जुड़ा हुआ सामने आया है। तो हुआ यूँ कि बीते दिन यानि कि 18 मार्च को मुज्जफरनगर के जिला न्यायधीश न एक महिला प्रदर्षनकारी के बलात्कार और लूटपाट के जुर्म में दो पूर्व पीएससी हवलदारों को जीवन भर के कारावास की सजा सुना दी है।

मुज़फ़्फ़रनगर के अतिरिक्त ज़िला सरकारी वकील (ADGC) प्रवेंद्र कुमार ने मीडिया को खुलासा किया कि अदालत ने रिटायर्ड कॉन्स्टेबलों – मिलाप सिंह और वीरेंद्र प्रताप – को इस जुर्म का दोषी ठहराया है । इनपर पचास हजार का जुर्माना लगा आजीवन कारावास के लिए जेल में डाल दिया गया है। ये दोनों कॉन्स्टेबल PAC की 41वीं बटालियन में कार्यरत थे जो घटना के समय ग़ाज़ियाबाद में कैंप में थे।

कैसे हुई ये बात ?

यह बात 1990 की है जिस समय मंडल कमीशन की सिफारिश लागु होने के बाद राजनितिक और पब्लिक विमर्श दो अलग अलग खेमो में बाँट दीये गए। उस समय युवाओ के अंदर तनाव भरा पड़ा था। सब इसी सोच में डूबे थे कि किसे सरकारी नौकरी मिलेगी किसे नहीं। इस तरह की बहुत सी बातें हवा के साथ फैल रही थी। हालाँकि पार्टियों ने मंडल का अच्छे से फ़ायदा उठाया। सबने अपने फ़ायदा देखने के लिए राजनितिक पक्ष पकड़ लिए। कईओं ने इसका विरोश भी किया। तो उसी समय मुलायम सिंह अपने वोट बैंक को आकर्षित करने के लिए OBC रिजर्वेशन को हर हाल में लागु करना चाहते थे। जैसे ही मंडल लागु हुआ तो पहले साल में ही यूपी के पिछड़े वर्ग के लिए पंद्रह परसेंट रिजर्वेशन लागू किया था। मंडल आने के बाद ये सीमा बढ़ा कर सत्ताइये परसेंट हुई और इस आरक्षण को पहाड़ी क्षेत्रो में अलग -अलग राज्य की मांग को तेज कर दिया गया और वहीँ OBC रिजर्वेशन के चलते नौकरियों पर मैदानी इलाको के लोगों ने अपना हक़ जमा लेंगे।

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सूत्रों के मुताबिक आंदोलनकारियों से बात कर पता चला
सबको लग रहा था कि हमारी नौकरियों पर बाहरवाले आकर कब्ज़ा कर लेंगे. गढ़वाली तो फ़ौज और पुलिस में ही भर्ती होना जानता है। वो भी छिन जाएगा, फिर बचेगा क्या? उस समय देश के आर्मी जनरल तक पहाड़ से थे। फ़ौज से ही आए भुवनचंद्र खंडूरी ने हम लोगों को इकट्ठा किया, और भी नेता थे, जिन्होंने भरोसा दिलवाया कि अलग राज्य के बिना पहाड़ियों का गुज़ारा नहीं।

आखिरकार हुआ क्या था ?

तो हुआ यूँ था कि उस दिन यानि कि साल 1994 तारीख़, 2 अक्टूबर और जगह थी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुज़फ़्फ़रनगर जो कि उत्तराखंड की मांग कर रहे लगातार कर रहे थे जिसमे आंदोलनकारियों ने तय कर लिया था कि दिल्ली जा कर प्रदर्शन चालु रखेंगे परन्तु उस समय इ प्रदेश सरकार ने इनका रास्ते में नाकेबंदी कर दी थी।

FIR में यह लिखा गया कि आंदोलनकारियों द्वारा दुकानें और गाड़ियों को जला दिया गया । हालत को देख वहां पर मौजूद अधिकारियों को फ़ायरिंग करनी पड़ी जिससे 6 लोगों की मौक़े पर ही मौत हो गई। पुलिस ने 1,500 प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध मामले दर्ज कि। कई सारे मामले बलात्कार, लूट, सबूतों को विकृत करने आदि के आरोप में पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ लगभग सात तरह के मामले दर्ज हुए

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