1975 में इमरजेंसी लगते ही वकील ने इस्तीफा दे दिया था, उनका 95 की उम्र में हुआ निधन।

चलिए तो बात करते हैं उसे वक्त की जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का ऐलान किया था तो उनके वकील ने मेज पर ही इस्तीफा पटक दिया था। साल 1975 दिन 25 जून, जगदीश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का ऐलान किया था। उस समय आजाद भारत के लोकतंत्र पर सबसे पहला प्रत्यक्ष हमला था। सब कुछ इधर-उधर हो रहा था विपक्ष जेल में नागरिकों की स्वतंत्रता निलंबित हो चुकी थी, प्रेस पर रोक लगा दी गई थी। नैतिकता के आधार पर लोगों ने एक-दो दिन में ही इस्तीफा देने शुरू कर दिए थे, तो कुछ से जबरदस्ती दिलवाए जा रहे थे ।

अगर हम बात करें साल 1972 की तो एडिशनल सॉलिस्टर जनरल बनाए गए थे उसे समय भारत के फली सैम नरीमन, उनका काम था कि वह एक कानून अधिकारी है जो सरकार को सलाह दें अदालत में सरकार के पक्ष में अपनी बात रखें। मगर जैसे ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का ऐलान किया ठीक उसी दिन उन्होंने कानून मंत्री गोखले को फोन किया और अपना पक्ष रखा फोन रखते ही वह दिल्ली चले गए और उन्होंने एक पत्र लिखा जिसमें एक पंक्ति और पत्र लिखकर भेज दिया।

उसे समय प्रेस भी बंद थी तो खबर ज्यादा उड़ नहीं पाई क्योंकि उसे पत्र में लिखा था इंदिरा सरकार के दूसरे सबसे बड़े वकील ने इस्तीफा दे दिया।

आपकी जानकारी के लिए बताते हैं कि बुधवार 21 फरवरी 2024 की सुबह संवैधानिक वकील भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल फली सैम नरीमन, जो भगवान को प्यार हो चुके।

जीवन की कुछ यादें

फली एस नरीमन जन्म 10 जनवरी 1929 को एक पारसी खानदान में हुआ था। जो कि म्यांमार के रंगून में रहते थे। उन्होंने अपनी माता-पिता के साथ वर्मा की यात्रा का भी एक जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है जिसमें वह दूसरे विश्व युद्ध के परिदृश्य में एक लंबी यात्रा पर गए थे।

इसमें उन्होंने एक हाथी के द्वारा रोन्द देने वाला किस्सा भी जाहिर किया है, इसके बाद वह भारत आ गए थे उन्होंने अपनी स्कूल की शिक्षा शिमला से पूरी की है इसके बाद उन्होंने मुंबई जाने का निर्णय लिया। उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज से अर्थशास्त्र और इतिहास में ग्रेजुएशन की। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण उन्होंने कानून को ही अपना आखिरी रास्ता माना, जबकि उनके पिता चाहते थे कि वह एक सिविल परीक्षा लिखें। कानून को अपना आखिरी चैन मानते हुए उन्होंने 1950 में गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल की और इस साल उन्होंने मुंबई हाई कोर्ट से वकालत शुरू कर दी।

सन 1957 में उन्हें हाई कोर्ट के जज बनने का निमंत्रण मिला उसे समय वह केवल 38 साल के थे, परंतु वे जज की उम्र के योग्य अभी नहीं थे तो उन्होंने इस नियुक्ति के लिए मना कर दिया। उन्होंने 22 साल तक हाई कोर्ट में प्रैक्टिस की और सन 1971 में अलअदालत में वरिष्ठ वकील अप्वॉइंट हुए।

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अगले ही साल उनका इंदिरा गांधी सरकार ने देश का अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भी बना दिया वह कानूनी अधिकारी बन गए। इन्होंने अपने साथ दशक के बेहतरीन अनुभव में सबसे बेजोड़ कम संवैधानिक कानून के विकास के लिए किया है।

जब एक इंटरव्यू के उनसे उनका पसंदीदा कर्म क्षेत्र पूछा गया तो उन्होंने बताया कि

“मुझे याद है बांग्लादेश की विदेश मंत्री मुझसे मिलने आए थे उन्हें बांग्लादेश के संविधान का मसौदा तैयार करना था मैं तब एडिशनल सॉलिसिटर जनरल था मैंने उन्हें कुछ आईडिया दिया लेकिन वह संविधान कुछ सालों से ज्यादा नहीं चल पाया संविधान लिखना आसान है हर जगह से विचार उधार लेना कोई बड़ी बात नहीं है संविधान को कैसे लागू किया जाए यह गंभीर चुनौती है और आकर्षक भी “

फनी नर्मिन ने अपना अधिकतर जीवन संवैधानिक सुधारो धर्मनिरपेक्ष मूल्य और आम आदमी को न्याय तक पहुंचाने के लिए लगा दिया, इनको सन 1991 में पद्म विभूषण और 2002 में न्याय के लिए ग्रुबर पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 2007 में पद्म विभूषण से।

चलिए आपको याद दिला दे अगर आप उनके समय के थे या फिर अगर आप आज की जनरेशन है तो हम आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नरीमन ने बहुत ही जिसके द्वारा भारतीय कानून को आकार दिया और कुछ मापदंड भी तय किया।

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